मेगसायसाय पुरस्कार विजेता डॉ पीके सेठी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के आर्थोपीडिक सर्जन थे । जयपुर फुट का अविष्कार कर उन्होंने दसियों हजार दिव्यांगों को नया जीवन दिया। जयपुर फुट का निर्माण डॉ सेठी की देखरेख में स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था । प्रस्तुत आलेख सेमिनार में प्रकाशित (2002) उनके अंग्रेजी आलेख ‘डॉक्टर्स इन ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ का अविकल हिंदी रूपांतर है।लगभग डेढ दशक पूर्व लिखा गया यह आलेख आज भी समाज के हर हितधारक तबके को आधुनिक चिकित्सा पद्धति और चिकित्सकों को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान करता है । हिंदी रूपांतर: विजय भास्कर।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो हम न केवल दवा उद्योग द्वारा फैलाये गये झूठ और फरेब से लड़ने में विफल रहे हैं, बल्कि उस उद्योग के लाभ के एक हिस्सेदार बन गये हैं। छोटे-मोटे गिफ्ट, महंगी डिनर पार्टियों ने हमें इस उद्योग का एक अंग बना दिया है। ‘न्यू साइंटिस्ट’ के पूर्व संपादक डेविड गाउल की किताब ‘द मेडिकल माफिया’ के पील पेडलर्सअध्याय में जो कुछ भी रहस्योद्घाटन किया गया है, वह आंखें खोल देनेवाला है।
यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि वास्तविक जीवन में हम सूक्ष्म जीवाणुओं की दुनिया के लिए बहुत कम हितकारी रहे हैं। संक्रमण नियम नहीं है। वास्तव में यह इतनी बार होता है और इतनी छोटे पैमाने पर होता है कि उसे अगर हम इस पृथ्वी पर बैक्टीरिया की भारी जनसंख्या के हिसाब से देखें तो यह कुछ भी नहीं है। ‘स्टाफाइलोकोक्साइ’ बैक्टीरिया हमारी पूरी त्वचा पर रहता है। अगर आप उनकी गिनती करें तो आप को आश्चर्य होगा कि इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद उससे आपकी त्वचा को कितना कम नुकसान पहुंचता है। हममें से केवल कुछ को ही फोड़े-फुंसियां होते हैं ‘स्ट्रोप्टोकोक्साइ’ बैक्टीरिया एक तरह से हमारे घनिष्टतम मित्रों में से हैं। वे हमारे गले में वर्षों से रहते आ रहे हैं। रियूमेटिक बुखार के रूप में वास्तव में बैक्टीरिया के प्रति हम अपनी प्रतिक्रिया का इजहार करते हैं और उससे हमें तकलीफ होती है।
वास्तव में हमारे और उनके (जीवाणु) के बीच एक बहुत अच्छी अंतरनिर्भरता है। हमारा जीवन एक दूसरे पर आश्रित है और हम एक दूसरे की सहायता करते हैं। एंटीबायोटिक खाते ही आंतों में बैक्टीरिया की आबादी जैसे ही खत्म हो जाती है, तो एक तरह से कहर बरप जाता है। इसके बारे में लूई थॉमस ने कहा था ‘पता नहीं किस कारण से ऐसा पागलपन है। लेकिन संभवतः यह हमारी तरफ से संक्रमण के विरोध की प्रतिक्रिया है। लेकिन यह पागलपन जैसा है, जिसका कारण पता नहीं क्या है।’ वास्तव में इनको नष्ट करने के लिए हमारे पास दवा के रूप में हथियारों का जो रासायनिक जखीरा है वह कहीं ज्यादा खतरनाक है बनिस्बत इन जीवाणुओं के। हमें ध्यान देना चाहिए कि वास्तव में हम इन विस्फोटक हथियारों के बीच जिंदगी गुजार रहे हैं।
इस बारे में मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं कि हम बहुत कम ध्यान मानव अंगों की शक्ति और क्षमता को बढ़ाने और उनका आदर सम्मान बहाल करने पर दे रहे हैं। यह वास्तव में मानव शरीर के प्रति स्वाभाविक निष्ठा में तोड़-मरोड़ तो है ही, साथ ही यह मानव की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसमें वह लाचार, हमेशा निगरानी में रहने को मजबूर और ढहने-बिखरने के लिए विवश नजर आता है। यही परम सिद्धांत, सूचना के रूप में मीडिया के जरिये हम तक पहुंचाया जाता है। वास्तव में हमें अपने स्वास्थ्य की दृष्टि से देखभाल और शिक्षण के लिए बेहतर प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिसमें जन सामान्य को स्वास्थ्य के मामले में अच्छी तरह से सूचित और शिक्षित किया जा सके। हमें पूर्ण आरोग्य के महत्व को समझते हुए इसकी सराहना करनी चाहिए। क्योंकि हममें से अधिकांश इसके हकदार है। हमारी कई बीमारियां अपने आप ठीक हो जाती हैं और कई तो दूसरे दिन उठने के साथ ही ठीक हो जाती हैं।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो हम न केवल दवा उद्योग द्वारा फैलाये गये झूठ और फरेब से लड़ने में असफल रहे हैं, बल्कि उस उद्योग के लाभ के एक हिस्सेदार बन गये हैं। छोटे-मोटे गिफ्ट, महंगी डिनर पार्टियों ने हमें इस उद्योग का एक अंग बना दिया है। ‘न्यू साइंटिस्ट’ के पूर्व संपादक डेविड गाउल की किताब ‘द मेडिकल माफिया’ के पील पेडलर्सअध्याय में जो कुछ भी रहस्योद्घाटन किया गया है, वह आंखें खोल देनेवाला है। वास्तव में प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों की पढ़ाई के बाद आगे की पूरी सतत शिक्षा इन दवा कंपनियों द्वारा तैयार ‘लिटरेचरों’ पर आधारित होती है, जो उन्हें मुफ्त दिये जाते हैं और लोग अब इस बात को जानते हैं। इस स्थिति में आखिर हम किस तरह अपने मरीजों का सम्मान और विश्वास हासिल कर सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल डिसप्ले, माइक्रोचिप्स, कंप्यूटर वगैरह जैसे टेक्नोलॉजी ने तो जैसे यह पूरा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया है। जिस तरह से मरीज और डॉक्टर रोग की शिनाख्त के लिए इन मशीनों पर निर्भर हो गये हैं, वह वास्तव में आश्चर्यजनक है। ऐसा लगता है कि कोई डॉक्टर न तो मशीनों के बिना किसी बीमारी की शिनाख्त करना चाहता है न ही कोई मरीज इन मशीनों के आधार पर निकले निष्कर्ष से अलग डॉक्टर की बात स्वीकारना चाहता है। एक तरह से बीमारी की शिनाख्त के लिए एक जटिल टेक्नोलॉजिकल उपकरणों का जखीरा तैयार कर लिया गया है।
बड़े-बड़े बायो इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों द्वारा नये नये यंत्र रोगों की शिनाख्त के लिए बनाये जा रहे हैं। गृहणियों का सामान्य कमर दर्द वास्तव में उनके दैनंदिन का नतीजा है। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, तो सीधे वे अपने ‘कैट स्कैन’ की ओर इशारा करती हैं (और अब तो एमआरआइ भी होने लगा है)। कहीं न कहीं उनकी सामान्य सी शिकायतों के लिए कोई न कोई उन्हें जयपुर से मुंबई इसलिए भेज रहा है कि वे एमआरआइ करा लें। कभी-कभी एमआरआइ का दूर-दूर तक रोग प्रभावित अंगों से नाता ही नहीं होता। एक तरह से एमआरआइ परीक्षण न होकर प्रमाण पत्र जैसा हो गया है। यह न केवल पैसे का भारी दुरुपयोग है, बल्कि बिल्कुल ही अनावश्यक भी है। यदि इसी पैसे का उपयोग किसी जरूरी सूचना को एकत्र करने के लिए किया जाता, तो मरीज के हक में कुछ उपयोगी हो पाता। वास्वत में हमने अब मरीजों के इलाज के बजाय एमआरआइ, सीटी स्कैन वगैरह से प्राप्त छाया नतीजों का इलाज करना शुरू कर दिया है।
इस तरह के पागलपन से तो कुछ डॉक्टर इतने परेशान हुए कि ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसीन’ ने एक आलेख ‘कैट फीवर’ के शीर्षक से प्रकाशित किया। यह आलेख हर डॉक्टर और हर मरीज को पढ़नी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद अचरज इस बात का है कि अभी जयपुर में पिछले दो साल में पांच सीटी स्कैन करनेवाले मशीनें लगी हैं। यह बिल्कुल साफ है कि इससे बहुत ज्यादा मुनाफा हो रहा है, तभी ये मशीनें लगायी जा रही हैं। ऐसी हालत में एक जिम्मेदार और ईमानदार डॉक्टर को क्या करना चाहिए ? क्या उसे बाजार की शक्तियों के दबाव के आगे समर्पण कर देना चाहिए ? अगर वह नहीं करता है, तो क्या मरीज उस पर ध्यान न देने का आरोप नहीं लगायेगा ? मेरे विचार से अब हम यह बरदास्त नहीं कर सकते कि इस मामले को यूं ही टरका दिया जाये या ठंडे बस्ते में डाल दिया जाये। वास्तव में इस पेशे में आयी विकृतियों से हमें और बड़ी तैयारी के साथ लड़ने की जरूरत है।
आइए जरा हम उस अत्यावश्यक टेक्नोलॉजी के प्रगति की बात करें। जिसे चिंतक फ्यूश ने टेक्नोलॉजी का आदेश बताया था। इसका अर्थ यह हुआ कि चाहे चितना भी खर्च लग जाये, हम अपना काम करते रहें। भले ही उसकी उपयोगिता उस खर्च के अनुकूल न हो। इस परिस्थिति में चिकित्सीय देखरेख का खर्च बढ़ता चला गया। लेकिन उसके अनुरूप ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह लगे कि उपचार की यह सबसे अच्छी पद्धति है। इंथोवेन ने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है जिसे ‘फ्लैट-ऑफ-द-कर्व-मेडिसीन’ का सिद्धांत कहा जाता है। इसका मतलब है आर्थिक नियमों की चिकित्सीय विभिन्नता यानी इस पद्धति में धन का झोंका जाना तो लगातार जारी रहता है पर उसके बदले हमें कम ही ऐसा मिल पाता है जो उपयोगी हो। आज की चिकित्सा पद्धति को यह कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी संभावना बने कि बहुत कम काम करके अच्छा परिणाम लोगों को दिया जा सके।

