जुगनू और सजीवन बूटी

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हमारी धरती पर पलबढ़ रहे जीवों में कीट-पतंगों की संख्या सबसे ज्यादा है। एक अनुमान के अनुसार कीट-पतंगों की एक लाख प्रजातियां धरती पर हैं । इनमें कई तो आस-पास नजर आते हैं। बड़ी हैरत से भरी है इनकी दुनिया। मक्खी, मच्छर, काकरोच सब हमारे जाने-पहचाने हैं। बरसात के मौसम में रोशनी के सामने कीड़ों के झुंड का मंड.राना एक सामान्य दृश्य है। पर आज बात ऐसे कीड़े के बारे में जिसे अंधेरा ज्यादा अच्छा लगता है और लोगों को उसे अंधेरे में देखना। कभी-कभी तो ये इतने ज्यादा इकट्ठे हो जाते हैं कि लगता है कि छोटे-छोटे बल्ब जलते-बुझते आंख मिचैली का खेल खेल रहे हों। बच्चों के लिए ये विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं और इसे मुट्ठी में बंद करके देखना उन्हें आनंदित करता है। पर अब कभी जुगनू नजदीक आएं तो जरा ध्यान से देखिए।

आम कीटों की तरह इनका शरीर भी तीन हिस्सों में बंटा होता है। सर, धड़ और उदर। धड़ और उदर के साथ इनके पंख जुड़े रहते हैं और उसी से जुड़े रहते हैं उनके पैर।

जहां तक जुगनू की बात है इसकी लगभग एक हजार प्रजातियां पूरी दुनिया में हैं । इनका आवास वैसे इलाकों में होता है जो न ज्यादा गर्म हैं और न ज्यादा ठंढे। इनकी लंबाई 0. 5 से 10 सेंटीमीटर तक हो सकती है। जिस अंग से प्रकाश फूटता है वह उदर भाग में स्थित होता है। इनमें कई प्रजातियां ऐसी हैं जिनसे फूटने वाले प्रकाश के रंग अलग-अलग होते हैं। कोई जुगनू अपने प्रकाश में पीलापन लिए हुए रहता है तो किसी में हरा रंग ज्यादा उभरता है। अन्य कीटों की तरह इनके जीवन चक्र में लारवा आता है और प्रकाश फूटने का क्रम लारवा से ही शुरू हो जाता है। ज्यादातर ये फूलों का रस चूसकर अपना भोजन करते हैं। एक विचित्रता इनमें यह है कि नर जुगनू वयस्क होने के बाद खाना बंद कर देता है, जबकि मादा जुगनू के खाने का क्रम चलता रहता है। दूसरे, नर जुगनू इधर से उधर उड़ान ज्यादा भरते हैं और मादा जुगनू छोटी-छोटी उड़ान भर कर एक जगह संयत होकर बैठ जाती है। एक सूक्ष्म अंतर और है नर और मादा जुगनू में। यह बात अगर गहराई से ध्यान दी जाए तभी पता चलेगा। दोनों के प्रकाश फेंकने में एक विशेष समयबद्धता या रिद्म होता है। नर जुगनू हर साढ़े पांच सेकेंड बाद प्रकाश फेंकता है, जबकि मादा जुगनू हर दो सेकेंड बाद प्रकाश फेंकती है। जुगनू का चमकना वास्तव में एक सिगनल प्रणाली जैसा है और इसी प्रणाली से नर या मादा एक दूसरे की पहचान करते हैं।

किसी जीव से प्रकाश निकलने की इस प्रक्रिया को बायोल्‍युमिनीसेंस या जैव प्रकाशकीयता कहते हैं। जाहिर है उत्कंठा यह होगी कि ये प्रकाश इनके शरीर में आता कहां से है ? लेकिन इससे पहले यह जान लेना बेहतर होगा कि इस प्रकाश से जुगनुओं को फायदा क्या मिलता है। कई वैज्ञानिक ऐसा सोचते हैं कि इस प्रकाश के कारण वे परभक्षियों का शिकार होने से बच जाते हैं। मेढ़क, छिपकली जैसे जीवों से इस प्रकाश के कारण वे बच निकलते हैं। पर इस बात को कई जीवविज्ञानी नहीं भी मानते। उनका कहना है कि मेढ़क इस प्रकाश के बावजूद जुगनुओं को निकलने में कोई कसर नहीं छोड़ते और धरती पर घूमते जुगनुओं को टप-टप कर निगलने चले जाते हैं। प्रकृति की यह देन जुगनुओं तक ही सीमित नहीं है। कई समुद्री जीव भी प्रकाश फेंकते हैं। कई मछलियां भी इस श्रेणी में आती है। यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक सिद्धांत है कि प्रकाश कहीं भी हो उसमें ऊर्जा खर्च होती है। एक बार प्रकाश करने के लिए जुगनू को साठ हजार कैलोरी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है और इस प्रकाश की तरंग लंबाई लगभग 500 से 660 नैनोमीटर के बीच होती है। न्यूजीलैंड में एक जुगनू ऐसा भी होता है जिसके धड़ में प्रकाश फूटने वाले तीन बिंदु होते हैं।

बायोल्‍युमिनीसेंस को अगर सीधे-सादे शब्दों में कहें तो यह एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें रासायनिक ऊर्जा का प्रकाशकीय ऊर्जा में रूपांतरण हो जाता है और यह रूपांतरण शत-प्रतिशत होता है। इसलिए इसे शीतल प्रकाश या चमक कहते हैं। सुनने में यह भले ही आसान लगे पर है यह एक जटिल रासायनिक प्रक्रिया।

जुगनुओं में एक जैविक पदार्थ पाया जाता है ल्यूसीफेरीन। इसके साथ ही इनमें मौजूद होता है एनजाइम ल्यूसीफेरेज। चूंकि यह उत्प्रेरक का काम करता है इसलिए ल्यूसीफेरिन के अणु मुक्त होकर ऑक्‍सीजन के अणु से मिल जाते हैं और रोशनी फूटने लगती है। अगर और गहरे पैठें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि इसमें एडिनोसिन ट्राइफासफेट या एटीपी की भी भागेदारी होती है। एटीपी दरअसल हर जीव में पाया जाता है और यह या तो ऊर्जा का भंडारण करता है या ऊर्जा बिखेरता है। जैसे जब हमारी मांसपेशियां खिंचती हैं तो उसके लिए ऊर्जा हमें एटीपी के टूटने से मिलती है और पेड़ों की पत्तियों में ऊर्जा जमा होती है तो एटीपी का संश्लेषण होता है। जुगनुओं में मौजूद एटीपी जब टूटता है तो रोशनी निकलती है और इसके समाप्त होते ही रोशनी बुझ जाती है। फिर जैसे ही ताजा एटीपी इसे मिलता है, टूटता है- रोशनी फिर आ जाती है। जुगनू में प्रकाश की गुत्थी सुलझाने के बाद वैज्ञानिक इस ओर आकृष्ट हुए कि यदि पौधों में इस एनजाइम को पहुंचा दिया जाए तो वे चमक सकते हैं या नहीं। उत्तरी कोरिया के वैज्ञानिकों को पूरी तो नहीं, पर आंशिक सफलता मिली है और कुछ पौधे रासायनिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद थोड़ा प्रकाश बिखेरने भी लगे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में अगर थोड़ी देर के लिए यह सोचा जाए कि कभी प्रकाश देने वाली सजीवन बूटी हुआ करती होगी तो थोड़ी कल्पना या बकवास कहकर उड़ा देना लगता है अब कठिन सिद्ध होगा।

चित्र तंबाकू के पौधे का है जिसे रोशन किया गया है इसे अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट साइंस [एएएएस] ने जारी किया है । वनस्‍पतियों को रोशन जीन इंजीनियरिंग के महकमे में आता है और यह महकमा विवादित भी रहता है पर इसे रोशन करने वाले वैज्ञानिक अपनी सफलता से स्‍ट्रीट लाइटें लगा कर शहर के शहर रोशन करना चाहते हैं तो उनके उद्देश्‍य पर सवालिया निशान भला कौन लगा सकता है।

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