21 वीं सदी में डॉक्‍टर[5] : गरीबों की डॉक्टरी देखभाल: Who’ll Look After the Poor!

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मेगसायसाय पुरस्‍कार विजेता डॉ पीके सेठी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के आर्थोपीडिक सर्जन थे । जयपुर फुट का अविष्कार कर उन्होंने दसियों हजार दिव्‍यांगों को नया जीवन दिया। जयपुर फुट का निर्माण डॉ सेठी की देखरेख में स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था । प्रस्तुत आलेख सेमिनार में प्रकाशित (2002) उनके अंग्रेजी आलेख ‘डॉक्टर्स इन ट्वेंटीफर्स्‍ट सेंचुरी’ का अविकल हिंदी रूपांतर है।लगभग डेढ दशक पूर्व लिखा गया यह आलेख आज भी समाज के हर हितधारक तबके को आधुनिक चिकित्‍सा पद्धति और चिकित्‍सकों को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान करता है । हिंदी रूपांतर: विजय भास्कर।

चिकित्सा कराने का खर्च दिनोंदिन जिस तरह से बढ़ता जा रहा है, वह गरीबों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। यह ज्यादातर महंगे और अनावश्यक टेक्नोलॉजी के प्रयोग के कारण हुआ है। ऊपर से डॉक्टरों में यह आकर्षण दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है कि वे महंगी से महंगी जांच मरीज की करायें। इस कारण हमारी यह चिकित्सा प्रणाली आर्थिक रूप से हमारे देश के लायक नहीं रह गयी है और शायद इसी का परिणाम है कि ज्यादातर मरीजों का कोपभाजन अब डॉक्टरों को बनना पड़ता है।

हमारी मेडिकल शिक्षा की जड़ें पश्चिमी देशों की हैं और उस आधार पर शिक्षा ग्रहण किये डॉक्टरों पर हम जोर देते हैं कि वे काम गांव में जा कर करें। यह वास्तव में अव्‍यावहारिक है। अब समय आ गया है कि डॉक्टर अपने इस पेशे के इस मसले के बारे में खुद ही फैसला करें। हमारी कुछ सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति पर काम कर रही हैं और गांव वालों को उनसे काफी सुकून मिल रहा है। मेडिकल कॉलेज वेल्‍लोर के डॉ एरोल काफी अच्छा काम कर रहे हैं। वे चाहते तो ढेर सारा पैसा कमा सकते थे। बजाय इसके उन्होंने गरीबों के लिए काम करना, गांव वालों के लिए काम करना अपना मिशन बनाया। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के सूखा पीडि़त गांव को अपना कार्य क्षेत्र बना कर जामखेड़ को उन्होंने एक किंवदंती में बदल दिया। उन्होंने निरक्षर ग्रामीण महिलाओं को कुशल स्वास्थ्यकर्मी के रूप में प्रशिक्षित किया है। अब वे गांव में सतत शिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं,जिसने ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी कारक बना दिया है। डॉ एरोल ने गांववालों की स्वास्थ्य का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर पहुंचा दिया है। इसकी तुलना विश्व के सबसे स्वस्थ क्षेत्र के आंकड़ों से की जा सकती है। मेरे लिए जामखेड़ एक तीर्थ स्थल बन गया है। डॉ एचएन अंटिया जेजे हास्प्टिल बंबई के प्लास्टिक सर्जरी विभाग में कभी अध्यक्ष हुआ करते थे और भारत के उन बहुत कम सर्जनों में उनका नाम शुमार है जिन्हें रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन इंग्लैंड से ‘ह्यूमैनिटेरियन प्रोफेसर’ का सम्मान मिला है। क्योंकि उन्होंने कुष्ठ रोग से विकृत हुए चेहरों की सर्जरी शुरू की और धीरे-धीरे इस रोग की तह तक जाने लगे। इसलिए अंततः सुकून उन्हें सामुदायिक चिकित्सा में मिला। अब वे एक अनुसंधान संस्थान चला रहे हैं। इसमें मेडिसीन, अर्थशास्त्र , समाज विज्ञान, सांख्यिकी की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं उनके साथ काम कर रही हैं।

बहुत कम ऐसे सर्जन होंगे जिन्होंने डॉक्‍टर अंटिया की तरह उच्च टेक्नोलॉजी के मिथक को इतनी सफलतापूर्वक ध्वस्त किया है। खासकर प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में। डॉ अंटिया के अर्दली भी काफी अच्छी तरह से कटी-कटी त्वचा की सिलाई कर लेते हैं और जिस कुशलता से वे अपना काम अंजाम देते हैं उसे देश कर किसी भी सर्जन को हैरत हो सकती है। डॉ अंटिया जटिल से जटिल ऑपरेशन भी गांव की झोपड़ी में बैठ कर कर सकते हैं। उन्हें जेजे हास्प्टिल के उस वातानुकूलित और जीवाणुओं से शत-प्रतिशत रक्षित बर्न विभाग की कोई जरूरत नहीं पड़ती, जो कभी उनकी ही देखरेख में विकसित हुआ था। ठाणे के जिला अस्‍पताल में उन्होंने जिस सफलता से और जिस साधारण तरीके से सर्जरी की, उसे तो दस्तावेज बना कर सभी अस्पतालों में वितरित कराया जाना चाहिए। यह कम से कम हमारे उन सर्जनों को चुप कर देने के लिए काफी है, जो ऑपरेशनके लिए सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण पहली शर्त मानते हैं। अब तो पांच सितारा अस्पताल देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं और नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण ही बिक्री के लिए उनका आधार वाक्य है। क्या हमें अपनी गाढ़ी कमायी को इस तरह उड़ा देना चाहिए ?

डॉ अरोल द्वारा जामखेड़ में और डॉ अंटिया द्वारा बंबई में या डॉ संजीव द्वारा मद्रास में किया गया काम ऐसा है जिस पर मेरे विचार से व्यापक रूप से चर्चा की जानी चाहिए। लेकिन ऐसे कामों में ‘मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया’ जैसी संस्थाएं त्रासद रूप से असफल रही हैं (यह उन्हीं का काम था)।

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