21 वीं सदी में डॉक्‍टर [6] आधुनिक चिकित्सा के लिए कुछ सवाल : Some Questions Remain Unanswered…

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मेगसायसाय पुरस्‍कार विजेता डॉ पीके सेठी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के आर्थोपीडिक सर्जन थे । जयपुर फुट का अविष्कार कर उन्होंने दसियों हजार दिव्‍यांगों को नया जीवन दिया। जयपुर फुट का निर्माण डॉ सेठी की देखरेख में स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था । प्रस्तुत आलेख सेमिनार में प्रकाशित (2002) उनके अंग्रेजी आलेख ‘डॉक्टर्स इन ट्वेंटीफर्स्‍ट सेंचुरी’ का अविकल हिंदी रूपांतर है।लगभग डेढ दशक पूर्व लिखा गया यह आलेख आज भी समाज के हर हितधारक तबके को आधुनिक चिकित्‍सा पद्धति और चिकित्‍सकों को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान करता है । हिंदी रूपांतर: विजय भास्कर।

यह वास्तव में मनोरंजक है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति के बारे में सवाल पश्चिम के संपन्न समाज में ही उठने शुरू हो गये हैं। हमें यहां थोड़ा रूक कर सोच-समझ लेने की जरूरत है। इससे पहले कि हम वहां से थोक भाव में टेक्नोलॉजी का आयात करें। क्योंकि कई चिंतक, जहां यह टेक्नोलॉजी विकसित हुई और परवान चढ़ी वहीं इस पर सवालिया निशान लगाने लगे हैं। सबसे तार्किक आलोच ना संभवतः इवान इलिच ने की है। जब मैंने उनकी किताब ‘मेडिकल नेमेसिस’ पहली बार पढ़ी, तो बिल्कुल बेचैन हो गया। अद्भुत विद्वता का प्रदर्शन करते हुए इलिच ने जिस तरह से आधुनिक चिकित्सा पर खोजपूर्ण निगाह डाली है और इसे कटघरे में ला खड़ा कर दिया है वह वास्तव में प्रशंसनीय है। उन्होंने चिकित्सा संस्थानों को स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा माना है। उनकी भूमिका पर प्रहार करते हुए उन्होंने तीन महत्पूर्ण प्रश्न बातें सामने रखी हैं:

  1. यह इतनी क्लिनिकल क्षति करता है जिसके सामने लाभ बिल्कुल ही बौना लगता है। कार्ल सैंडबर्ग को याद कीजिये – उन्होंने कहा था ‘मैंने इतनी दवा ले ली थी कि अच्छा होने में मुझे काफी समय लग गया।’
  2. अति औद्योगिक समाज के कारण बीमारी बढ़ी है।
  3. यह (आधुनिक चिकित्सा पद्धति) व्यक्ति से स्वयं निरोग होने की क्षमता छीन लेती है।

इस मेडिकल ऑडिट में आधुनिक चिकित्सा पद्धति की तथाकथित उपलब्धियों को जिस तरह से प्रस्तुत किया गया है, उस पर हमें विचार करना होगा। ये तथाकथित उपलब्धियां वास्तव में सामाजिक सुधार के कारण हुई हैं, न कि चिकित्सा में किसी तरह की बेहतरी के कारण। भोजन, आवास, काम करने के अलावा पड़ोसी से प्रगाढ़ता और सांस्कृतिक तकनीक जनसंख्या को स्थायी रखने में मदद करते हैं। इलिच की बातें प्रसिद्ध चिकित्सा दार्शनिक रेने डूबियोस के निष्कर्षों का ही रेखांकन करती हैं। उन्होंने महत्वपूर्ण मुद्दा जो उठाया है वह है आधुनिक औषधियों की भूमिका। ये औषधियां पीड़ा, अंग विच्छेद और मृत्यु को एक व्यक्तिगत चुनौती के बदले टेक्नोलॉजिकल समस्या के रूप में बदल देती हैं। हम इस बात के अपराधी हैं कि हम, लोगों को यह सीखने का अवसर नहीं देते कि वे अपनी चुनौतियों से, समस्याओं से कैसे निपटें। उन्हें हम निष्क्रिय होने के लिए हर तरह मजबूर कर देते हैं कि वे इस संगठित व्यवसाय के आगे घुटने टेक दें, जिनका पूरा का पूरा उद्देश्य अपने ग्राहकों का आधार बड़ा करना है। हमलोग अपने ज्ञान को एक हथियार के रूप में भांजते हैं। हमारा व्यवसाय सचमुच एक अपंग व्यवसाय हो गया है।

इस व्यवसाय के अंदर से ही विरोध की ध्वनि मिलने लगी है। ‘मेडिसीन आउट ऑफ कंट्रोल – द एनाटमी ऑफ मैलिग्नेंट टेक्नोलॉजी ’ डॉ रिचर्ड टेलर की ताजा पुस्तक है। जिन लोगों को आधुनिक दवाओं की अति बिक्री के बारे में जानकारी लेनी है, जिन लोगों को अति जांच के बारे में जानकारी लेनी है, जिनको सुपर स्पेशलिस्ट – कोरोनरी केयर यूनिट या अनावश्यक सर्जरी के बारे में जानकारी लेनी है, स्क्रीनिंग और मेडिकल चेकअप के बारे में जानकारी लेनी है, गर्भ धारण और शिशु जन्म के बीमारीकरण की जानकारी लेनी है और जिन्हें जीवन के चिकित्साकरण की जानकारी लेनी है, उनके लिए इस पुस्तक में महत्वपूर्ण तथ्य हैं। इसे पढ़ कर यह सहज ही लगने लगता है कि विज्ञान में मेडिसीन का उपयोग एक बात है और इसका व्यवहार बिल्कुल ही दूसरी बात। न्यूक्लियर विज्ञान और न्यूक्लियर हथियारों के प्रसार का उदाहरण देना यहां गलत नहीं होगा।

दूसरे तरह के आलोचक अवधारणा की समस्या सामने लाते हैं। जिसे काफी खूबी से डॉ आशीष नंदी और डॉ शिव विश्वनाथन ने एक सेमिनार के परचे में समेटा था। इसका शीर्षक था ‘मॉडर्न मेडिसीन एंड इट्स ननमेडिकल क्रिटिक्स।’ इस आलेख के अनुसार डॉक्टर और मरीज के बीच का संबंध काफी तरीके से नष्ट किया जा रहा है और डॉक्टर के लिए मरीज कोई व्यक्ति न रह कर केवल प्रयोगशाला से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित तथ्य भर रह जाता है। यह छाया मरीज (रक्त, इसीजी, एक्स-रे आदि की रपट) एक सच्चाई बन कर डॉक्टर के सामने आ खड़ा होता है और आधुनिक अस्पताल इसी छाया मरीज के बारे में चिंतित हैं। इसके अलावा बाकी सब बातें क्लिनिकल विभिन्नताएं (वैरिएबल्स) मानी जाती हैं और इसे मेडिसीन विज्ञान से समझौता करना पड़ता है।

परचे में डॉक्टर आशीष नंदी ने बताया था कि समस्या केवल मेडिकल टेक्नोलॉजी के अमानवीयकरण की नहीं है गंभीर समस्या है डॉक्टरों के अमानवीयकरण की। जैसे-जैसे यह चिकित्सा प्रणाली पूंजी और बड़ी टेक्नोलॉजी पर आधारित होती जा रही है, एक औसत डॉक्टर को अपने आप को इस व्यवस्था का अंग मानकर ही काम करना पड़ेगा। जरूरत इस बात की है कि इस रूख पर ही प्रहार किया जाये और इसके लिए जरूरी है कि मेडिकल प्रैक्टिस की अवधारणा पर फिर से विचार किया जाये। इसमें हमें जनरल प्रैक्टिशनर या जनरल फिजिशियंस की अवधारणा फिर से जीवित करनी पड़ेगी । जो अपने मरीज की बातों पर भरोसा करे, न कि विभिन्न परीक्षणों से आये परिणामों पर। आज ऐसे फिजिशियन जिनकी बहुत ज्यादा इज्जत होनी चाहिए वास्तव में उन्हें अवैज्ञानिक मान लिया जाता है।

मेडिसीन के क्षेत्र में विशेषज्ञता को तरजीह देना एक अलग समस्या है, जिसका समाधान हमें खोजना है। हालत अब यह हो गयी है कि शरीर के हर अंग के रोग के लिए अलग तरह के विशेषज्ञ से सलाह लेनी पड़ती है। मानो ये अलग-अलग स्वतंत्र अस्तित्व हों। जबकि सच्चाई यह है कि पूरा शरीर एक स्वतंत्र अस्तित्व है और उसी हिसाब से इलाज किया जाना चाहिए। पारिवारिक चिकित्सा या जनरल फिजिशियन (जीपी) इस आपाधापी और में कहीं खो सा गया है। उसे अनिच्छित रू प से महिमामंडन से शेष बचे डॉक्टरों में गिना जाता है, जबकि होना यह चाहिए था कि सबसे ज्यादा महत्व इन्हें मिलता। मैं अनुरोध करता हूं कि पारिवारिक चिकित्सक को हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के पद सोपान में ज्यादा इज्जत बख्सी जाये। मैं उन्हें विशेषज्ञों से ऊपर की श्रेणी में रखना चाहूंगा और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में ऐसा ही होता है।

सभी चिकित्सा प्रणालियां इस जीव मंडल का एक भाग हैं। अब समय आ गया है कि हम यह महसूस करें की जीव मंडल से ज्यादा छेड़छाड़ या मेडिकल हस्तक्षेप (बैक्टीरिया और वायरस की ज्यादा शक्तिशाली प्रजाति) अच्छा नहीं है। सत्य यह है कि इस ब्रह्मांड में मानव हस्तक्षेप की एक सीमा है। कभी-कभी हम अनावश्यक हस्तक्षेप कर अपने लिए जटिल समस्या खड़ी कर लेते हैं। यह जरूरी है कि हम आनेवाली पीढ़ी के लिए जीवन और कठिन न बनायें।

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