मेगसायसाय पुरस्कार विजेता डॉ पीके सेठी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के आर्थोपीडिक सर्जन थे । जयपुर फुट का अविष्कार कर उन्होंने दसियों हजार दिव्यांगों को नया जीवन दिया। जयपुर फुट का निर्माण डॉ सेठी की देखरेख में स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था । प्रस्तुत आलेख सेमिनार में प्रकाशित (2002) उनके अंग्रेजी आलेख ‘डॉक्टर्स इन ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ का अविकल हिंदी रूपांतर है।लगभग डेढ दशक पूर्व लिखा गया यह आलेख आज भी समाज के हर हितधारक तबके को आधुनिक चिकित्सा पद्धति और चिकित्सकों को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान करता है । हिंदी रूपांतर: विजय भास्कर।
मैं उस समय बड़ा हुआ और पढ़ाई-लिखाई की जब यहां औपनिवेशिक शासन था। मैंने शहरी वातावरण में पश्चिमी यानी एलोपैथी की विधि से चिकित्सा को अपना व्यवसाय बनाया। मैं गवाह रहा हूं उस समय का जब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कुछ प्रभावी बैक्टीरिया निरोधी दवाएं आयीं और जिनसे घातक बीमारियों जैसे निमोनिया, टीबी आदि का इलाज बेहतर तरीके से हो सकता था। इन अनुसंधानों से पहले, एलोपैथी हमारे यहां की परंपरागत चिकित्सा प्रणाली के बराबर ही महत्व रखती थी। लेकिन बैक्टीरिया निरोधी दवाओं की खोज के तुरत बाद इसमें क्रांतिकारी बदलाव आया। मैं इस विश्वास से भरा हुआ था कि इस सफलता में स्वास्थ्य की समस्याओं का सर्वश्रेष्ठ हल छिपा हुआ है।लेकिन आज मैं कुछ दिग्भ्रमित हूं। रोगों पर जीत हासिल करने या अपने लोगों को न्यायसंगत सेवा देने के लक्ष्य के अपने सपने के करीब पहुंचने के बावजूद उस वास्तविक लक्ष्य तक पहुंचने में न केवल हम विफल रहे , बल्कि देख हम यह रहे हैं कि एक समय जो पेशा लोगों के घाव भरने का काम करता था वह कुछ यांत्रिक और बहुत कुछ व्यापारिक पेशे मे बदल गया है। पुराने समय के ऐसे डॉक्टर, जो बीमारी पर मरहम रखने का काम करते थे, अब धीरे-धीरे अतीत की धरोहर बनते जा रहे हैं। हो सकता है हम अपेक्षाकृत ज्यादा योग्य हो गये हों। लेकिन सच यह भी है कि हम अब ज्यादा अमानवीय हो गये हैं और हम, जो कभी समाज में आदर के सबसे आदर्श पात्र समझे जाते थे, अब लोगों ने हमारी पात्रता पर सवाल उठाने शुरू कर दिये हैं। आखिर कहां गलती हुई और क्यों ? यह सवाल मैं अक्सर अपने आप से पूछता हूं।
यह अस्वाभाविक नहीं होगा कि आगे बढ़ते हुए हम थोड़ा अपने रूमानी अतीत की ओर लौटें और उन स्वर्णिम दिनों की याद ताजा करें। ‘उस समय सबकुछ कितना अच्छा था’ अक्सर लोग कहते हैं, मैं इस तरह के विलासितावाले विवाद में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन मैं विश्वास करता हूं कि बावजूद उन सारी प्रगति की जो हमने की है – हमने कुछ मूल्यवान खो दिया है और उस ‘कुछ’ की फिर से तलाश कर पा लेना मेरी नजर में आज सबसे ज्यादा महत्व का हो गया है। मैं बता दूं कि इस बारे में मैं कोई बहुत बड़ा हल नहीं सुझाने जा रहा हूं। मेरे जो व्यक्तिगत अनुभव हैं, जो कुछ अपनी प्रैक्टिस से दौरान मैंने हासिल किया है, उन्हें ही आपके सामने रख रहा हूं।
जब मेडिकल कॉलेज में मैंने दाखिला लिया, तब यह सम्मानित पेशे के रूप में समझा जाता था। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मैं ढेर सारे पैसे कमाऊंगा। हां यह बात जरूर थी कि मैं अपने मरीजों का सम्मान और स्नेह पाने का हकदार बनना चाहता था भले ही मुझे थोड़ी कठिनाई में जीवन क्यों न जीना पड़े। लेकिन मुझे यह भी विश्वास था कि मोटे तौर पर मैं ठीक-ठाक कमाई कर लूंगा और अच्छी हैसियत में रहूंगा।
हमारे कॉलेज में कुछ अच्छे शिक्षक थे, कुछ बुरे भी। लेकिन जो अच्छे थे, वे वास्तव में बहुत अच्छे थे। उन्हें अपने छात्रों की चिंता थी। छात्रों को वे नाम से जानते थे और उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श उन छात्रों के सामने पेश किया। शायद औपनिवेशिक शासन के प्रभाव के कारण वे अचेतन रूप से ही सही, यह साबित कर दिखाना चाहते थे कि क्षमता की दृष्टि से वे ब्रिटिश डॉक्टरों के मुकाबले किसी तरह कम नहीं हैं। इसने कुछ शिक्षकों को बिल्कुल ही स्वतंत्र बना दिया और हमलोग एक तरह से उनकी पूजा करते थे। उसमें से ज्यादातर लोग ढेर सारे अनुसंधान पत्र लिखने में ज्यादा रुचि रखते थे। लेकिन पढ़ाने के मामले में उनमें काफी मौलिकता थी। तब आज के आडियो -वीडियो जैसे पढ़ाई में सहायता करनेवाले तामझाम उनके लिए उपलब्ध नहीं थे। लेकिन वे अपनी कौशलपूर्ण अभिव्यक्ति से इन सारे तामझाम की भरपाई कर देते थे और हमें विषय को समझने में कोई कठिनाई नहीं आती थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि हम उन तक हमेशा ही पहुंच सकते थे और वे काफी गर्व करते थे, जब उनके छात्र परीक्षा में अच्छा परिणाम लाते थे।
जब हम सब ने प्रैक्टिस शुरू की उस समय मेडिसीन, कला ज्यादा था और विज्ञान कम । आम मारक बीमारियों के लिए हमारे पास देने के लिए ज्यादा नहीं रहता था इसलिए हम ज्यादातर उन उपचारों पर निर्भर करते थे जो आज के जमाने के हिसाब से मेडिसीन का गैर टेक्नोलॉजी वाला पक्ष करार दिया जाता है। इस उपचार में हमें मरीज से काफी बातचीत करनी पड़ती थी। मरीज का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे दिलासा देनी पड़ती थी । मरीज के पास खड़ा रह कर उस पर काफी कुछ ध्यान देना पड़ता था। कहीं न कहीं हम मानवीय संवेदनाओं को छू रहे होते थे। हालांकि यह सब गैर टेक्नोलॉजी वाला पक्ष था फिर भी इससे मरीज को एक अपनापन मिलता था। उसमें आत्मविश्वास बढ़ता था और मरीज के परिवार को काफी सहारा मिलता था। मरीज में अच्छा होने की इच्छाशक्ति बढ़ती थी। ये सारे कारक मरीज की हालत सुधारने के लिए काफी जरूरी हैं। तब एक अच्छा डॉक्टर अपने समाज की अच्छी समझ रखने के साथ-साथ दूरदृष्टि भी रखता था।
21 वीं सदी में डॉक्टर -2
कुछ उपन्यास कुछ किताबें
पारंपरिक ढंग से उपचार करनेवाले, अगर आप याद करें, तो अपनी कला में माहिर थे और उनकी इस महारथ की जड़ें देश की परंपरा, संस्कृति और लोगों के विचारों के आधार में जमी हुई थीं। वे ऐसी भाषा और ऐसे मुहावरे का इस्तेमाल करते थे, जो मरीज की समझ में बहुत आसानी से आ जाता था। जब ऐसे लोगों पर से शासन का यह वरदहस्त हट गया, तो धीरे-धीरे ये लोग शहरों की ओर जाने लगे। ग्रामीण भारत हमेशा ही औपनिवेशिक समय में उपेक्षित किया गया। और एक तरह से कहें तो वह आज भी उतना ही उपेक्षित है। मगर पारंपरिक और एलोपैथी चिकित्सा पद्धतिेयों का अंतर समझाने के लिए मुझे कहा जाये, तो मैं तारा शंकर बंदोपाध्याय के उपन्यास ‘आरोग्य निकेतन’ से अच्छी कोई सिफारिश नहीं कर सकता। यह बांग्ला उपन्यास मेरी दृष्टि से मेडिकल के हर छात्र को पढ़ने के लिए आवश्यक कर देना चाहिए। इससे बेहतर दृष्टि (चिकित्सा के संदर्भ में) कहीं और मिलनी मुश्किल है। इसी संदर्भ में एक दो और विद्वतापूर्ण पुस्तक का मैं नाम लेना चाहूंगा, जिसमें इस संदर्भ में ढेर सारी दृष्टि मिलेगी। एक किताब है पूनम बाला की ‘इंपीरियलिज्म एंड मेडिसीन इन बंगाल’ (साम्राज्यवाद और बंगाल में चिकित्सा) दूसरा डेविड आरनॉल्ड द्वारा संपादित ‘इंपीरियल मेडिसीन एंड इंडीजिनस सोसायटीज’ – एलोपैथी के चिकित्सक के रूप में मुझमें जो भी ठसक थी, उसमें इन दोनों पुस्तकों के पढ़ने के बाद उसमें खासी कमी आयी है।
पारंपरिक चिकित्सा इसलिए आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि इसे राज्याश्रय नहीं मिला, तो दूसरी ओर पश्चिम की एलोपैथी में वैज्ञानिक पद्धति को अपना मुख्य औजार बनाया। इसके लिए बहुत हद तक हम विज्ञान के ऋणी रहेंगे। इससे कुछ ऐसी जरूरी सूचनाएं जरूर मिली हैं, जो दीर्घ अवधि के परिश्रम का परिणाम हैं और इससे मानव शरीर विज्ञान को बेहतर ढंग से समझने में हमें काफी मदद मिली है। आज हम इस बात को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं कि किसी औषधि के प्रयोग के बाद शरीर में क्या क्रिया-प्रतिक्रिया होगी और किस तरफ क्या करने पर शरीर का संतुलन बिगड़ जायेगा। लेकिन हमें यह बात भी स्वीकार करनी चाहिए और ईमानदारी से स्वीकार करनी चाहिए कि अब भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसके बारे में हमें कोई भी सुराग तक नहीं मिल पाया है। हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि हमारा अज्ञान हमारे इस शास्त्र-ज्ञान से कहीं अधिक विशाल आयाम में है। इसीलिए हममें पहले की अपेक्षा आज कहीं और ज्यादा विज्ञान की जरूरत है।
विटामिन की खोज और हारमोन की खोज, पानी और इलेक्ट्रोलाइट के संतुलन के ज्ञान से हमें ऐसी बहुत सी बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज करने में सहायता मिली है, जो पहले अक्सर जान ले लिया करती थीं। डायबिटीज, टीबी, टायफाइड, निमोनिया और कुछ बैक्टीरिया के संक्रमण अब उतने भयावह नहीं लगते, जितने पहले महसूस होते थे। लेकिन अब भी कोई बीसियों ऐसी बीमारी बता सकता हूं, जिसमें हमारे पास बतौर उपचार करने के लिए कुछ खास नहीं रह जाता। इनमें कैंसर, जोड़ों का दर्द, हृदयाघात, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां हैं। इनके बारे मेंबहुत कम सुराग हमारे पास है। एक तरह से कहें तो इन बीमारियों के बारे में हम अब भी उतने ही अज्ञानी हैं, जितनी संक्रामक बीमारियों के बारे में 1875 के समय में थे। इसलिए हमें कोशिश यह करनी चाहिए कि कुछ उपयोगी जानकारी पूरी दुनिया से इस बारे में सामने आये और व्यापक सामाजिक हित में उसका उपयोग हो सके।
इस बारे में मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं कि हम बहुत कम ध्यान मानव अंगों की शक्ति और क्षमता को बढ़ाने और उनका आदर सम्मान बहाल करने पर दे रहे हैं। यह वास्तव में मानव शरीर के प्रति स्वाभाविक निष्ठा में तोड़-मरोड़ तो है ही, साथ ही यह मानव की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसमें वह लाचार, हमेशा निगरानी में रहने को मजबूर और ढहने-बिखरने के लिए विवश नजर आता है। यही परम सिद्धांत, सूचना के रूप में मीडिया के जरिये हम तक पहुंचाया जाता है।
वैज्ञानिक तौर-तरीकों ने इलाज करने की पुरानी विधि में एक अजीब तरह का बदलाव ला दिया। माप-जोख किसी भी वैज्ञानिक अवधारणा की पहली शर्त होती है। धीरे-धीरे इस व्यवसाय के वैज्ञानिक चोले में माप-जोख अपनी हैसियत बढ़ाते चले गये। इन माप-जोखों के आगे मरीज की स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं या उनकी तकलीफों को महज इसलिए नकार दिया गया, क्योंकि आंकड़ों के विज्ञान की परिभाषा में वे कहीं फिट नहीं होते थे। वेदनाओं को किसी आंकड़े में अनूदित करना वास्तव में कठिन है। धीरे-धीरे प्रयोगशाला की जांच की अहमियत बढ़ती गयी और डॉक्टर की अहमियत कम होती गयी। इन्हें कानूनी वैधता भी मिली। धीरे-धीरे हम डॉक्टरों ने अच्छा श्रोता होना छोड़ दिया और मरीज से बढ़ता हुआ फासला ही सम्मान का मानक बन गया। मरीज और डॉक्टर के बीच के भावनात्मक रिश्ते धीरे-धीरे दरकने शुरू हो गये।
हालांकि किसी को भी आंकड़ों को एकत्र करने और उनको विश्लेषित करने को लेकर कोई तर्क-वितर्क तो नहीं किया जा सकता। लेकिन दिक्कत यह हुई कि मरीज से सुनने के बाद आंकड़े एकत्र करने की प्रक्रिया समाप्त हो गयी। हाल में इसके महत्व को फिर से समझा जाने लगा है। ओलिवर सैक्स की किताब ‘मिग्रेन’ जब मैंने पढ़ी, तो मुझे पहली बार यह लगा कि किसी ने तो मुझे सही समझा। ‘मिग्रेन’ पर अन्य किसी विद्वता से भरी पुस्तक ने ‘मिग्रेन’ की मेरी अपनी समस्या से निपटने में उतनी मदद नहीं की, जितना इस पुस्तक ने। ओलिवर सैक्स को घुटने में भीषण चोट के कारण लंबे समय तक एक अस्पताल में प्लास्टर के साथ रहना पड़ा। उनकी किताब ‘ए लेग टू स्टैंड ऑन’ स्वस्थ होने और अच्छा महसूस करने की स्वाभाविक प्रक्रिया पर जितना अच्छा हल प्रस्तुत करती है, उतना इसी विषय पर लिखे हुए मेडिकल के पारंपरिक पाठ्य पुस्तक नहीं करते।
इस तरह से देखें तो इस तरह का अनुसंधान लगभग हर कोई कर सकता है। अपनी जनरल प्रैक्टिस में इससे मानवीय स्तर पर बेहतर ढंग से उपचार करने के लिए नये तौर-तरीके हमें मिल जायेंगे। मैं किसी भी मरीज के सही-सही और ईमानदारी से दिये गये विशद् विवरण को किसी भी अनुसंधान से ज्यादा अहमियत देता हूं। किसी संदेहास्पद प्रयोगशाला में आंकड़ों की कलाबाजी या लंबे-लंबे टेबल से उपजे अनुसंधान, से ज्यादा महत्व मरीज के अपने बारे में ईमानदार विवरण का है। लेकिन हमारे मेडिकल जरनल ऐसे विवरणों को प्रकाशित करने में कोई खास रुचि नहीं रखते। मेरी बड़ी इच्छा है कि कुछ लोग सामने आयें और मरीजों के विवरण को एक साथ लेकर प्रकाशित करने की शुरुआत तो की जाये।
यही समय था जब उपचार के रूप में दवा उद्योग ने स्वरूप लेना शुरू किया। इस उद्योग के लिए तो जैसे एक भारी बाजार पहले से उपलब्ध था, जिसका दोहन भर किया जाना था। शक्तिशाली विज्ञापन माध्यम का इस्तेमाल करते हुए दवा कंपनियां हमको यह विश्वास दिलाने में सफल रहीं कि हम बिल्कुल रोगों से घिरे हुए हैं। चारों ओर से विषाणु हम पर हमला करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि विषाणुओं के संक्रमण से बचाने के लिए हम इस उद्योग से बनी ढाल वे हमें देंगे। इसके लिए हमें उन रासायनिक हथियारों (दवाओं) के जरिये इन विषाणुओं को नष्ट करते रहना पड़ता है। हम एक छोटी सी खरोंच के लिए भी शक्तिशाली एंटीबायोटिक का उपयोग करते हैं और उन्हें प्लास्टिक से ढंक देते हैं। हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां हमेशा यह अहसास होता है कि विषाणु हमला कर अब हमें मार ही डालेंगे और हम इसी भय के साथ जीते रहना हमारी त्रासदी बन गयी है।
यह लुई पास्चर के श्रम साध्य वैज्ञानिक खोज का एक तरह से यह व्यावसायिक शोषण का उदाहरण है, जो अब एक संगठित और अत्याधुनिक दावन विज्ञान बन गया है। हम यह मान कर चलते हैं कि बैक्टीरिया किसी तरह हमको तंग कर जिंदा रहने में आनंद का अनुभव करते हैं। वैसे रहने के लिए स्वस्थ तौर-तरीके अपनाना अच्छी बात है, लेकिन एक ऐसे भयावह कल्पनालोक में रहना जिसमें हम बैक्टीरिया से हमेशा खौफजदा रहें सामाजिक पैमाने पर दिग्भ्रमित करनेवाले पागलपन से कम नहीं है। अगर हम याद करें कि लूई पास्चर ने अपनी मृत्यु शैय्या पर कहा था ‘बैक्टीरिया कुछ नहीं है। भूभाग ही सब कुछ है।’ यह एक तरह से ‘माटी और बीज’ की अवधारणा के प्रति एक विनम्र अभिव्यक्ति थी, जिसे हमारे पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में बहुत शुरू में ही पहचान लिया गया था।

