चाय की चुस्की और अल्यूमिनियम

midhaxainnovations@gmail.com
7 Min Read

कभी-कभी वैज्ञानिक निष्कर्ष बेहद चैंकाने वाले सिद्ध होते हैं। कुछ दिन पहले यह बात सामने आयी है कि अल्‍युमीनियम के बर्तन में बना भोजन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। भारत में चाय सबसे ज्यादा पी जाती है और कुछ घरों और दुकानों को छोड़ दें तो चाय बनायी जाने वाली केतली, अल्युमीनियम की ही उपयोग में आती है। वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष सर्वेक्षण के आधार पर निकाला है उसके अनुसार शरीर में अल्युमीनियम की अधिकता ‘डेमेंशिया’ नामक रोग को जन्म दे सकती है। जिसमें एक-एक कर मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है। शरीर में अल्युमीनियम की अधिक मात्रा अल्युमीनियम के बर्तनों में बने चाय या दूसरे खाद्य पदार्थ खाने से शरीर में पहुंच सकती है।

अल्युमीनियम की ज्यादा मात्रा अल्ज़ाइमर्सबीमारी का भी कारण बन सकती है। अल्ज़ाइमर्सकी बीमारी से ग्रस्त लोगों की मस्तिष्क कोशिकाओं में अल्युमीनियम कीमात्रा अपेक्षाकृत अधिक पायी गयी है । अल्युमीनियम को लेकर श्रीलंका और ब्रिटेन में प्रयोग शुरू हुए। दोनों के निष्कर्ष समान आये। इस निष्कर्ष के अनुसार अल्युमीनियम के बर्तन में खाना बनाने या चाय बनाने से अल्युमीनियम की काफी मात्रा शरीर में पहुंच जाती है जिसका वैषिक प्रभाव घातक हो सकता है। डाक्टरों ने इसे ‘‘न्यूरो-टाकसिक’’ बताया है (न्यूरो टाकसिक अर्थात संज्ञा तंतु का विषाक्त होना)। श्रीलंका में हुएकभी-कभी वैज्ञानिक निष्कर्ष बेहद चैंकाने वाले सिद्ध होते हैं। कुछ दिन पहले यह बात सामने आयी है कि अल्‍युमीनियम के बर्तन में बना भोजन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। भारत में चाय सबसे ज्यादा पी जाती है और कुछ घरों और दुकानों को छोड़ दें तो चाय बनायी जाने वाली केतली, अल्युमीनियम की ही उपयोग में आती है। वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष सर्वेक्षण के आधार पर निकाला है उसके अनुसार शरीर में अल्युमीनियम की अधिकता ‘डेमेंशिया’ नामक रोग को जन्म दे सकती है। जिसमें एक-एक कर मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है। शरीर में अल्युमीनियम की अधिक मात्रा अल्युमीनियम के बर्तनों में बने चाय या दूसरे खाद्य पदार्थ खाने से शरीर में पहुंच सकती है।

अल्युमीनियम की ज्यादा मात्रा अल्ज़ाइमर्सबीमारी का भी कारण बन सकती है। अल्ज़ाइमर्सकी बीमारी से ग्रस्त लोगों की मस्तिष्क कोशिकाओं में अल्युमीनियम कीमात्रा अपेक्षाकृत अधिक पायी गयी है । अल्युमीनियम को लेकर श्रीलंका और ब्रिटेन में प्रयोग शुरू हुए। दोनों के निष्कर्ष समान आये। इस निष्कर्ष के अनुसार अल्युमीनियम के बर्तन में खाना बनाने या चाय बनाने से अल्युमीनियम की काफी मात्रा शरीर में पहुंच जाती है जिसका वैषिक प्रभाव घातक हो सकता है। डाक्टरों ने इसे ‘‘न्यूरो-टाकसिक’’ बताया है (न्यूरो टाकसिक अर्थात संज्ञा तंतु का विषाक्त होना)। श्रीलंका में हुएप्रयोगों में यह पाया गया कि अल्युमीनियम के बर्तन में अगर पानी गर्म किया जाता है तो अल्युमीनियम का फ्लोराइड बनता है और पानी में घुलनशील यह फ्लोराइड खाद्य पदार्थों के माध्यम से शरीर में पहुंचकर वैषिक प्रभाव उत्पन्न करता है।

भारत को इस विषय में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि यहां चाय पीने वाली आबादी विश्व में सबसे ज्यादा है और लगभग 13 राज्यों में जल का फ्लोराइड स्तर असामान्य रूप से ऊंचा है। वैसे, अनुसंधान कर रहे चिकित्सक इस निष्कर्ष तक तो पहुंच गए हैं पर पूरी आंतरिक प्रक्रिया समझ पाने में वे सफल नहीं हो पाए हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार संभवतः इस तत्व के शरीर के भीतर पहुंचने के बाद रासायनिक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया से तत्व के लवण बनते हैं जो शरीर में घुल जाते हैं।

इन रसायनों की माप जोख का एक अलग पैमाना होता है। जैसे 10 लाखवें हिस्से में अगर रसायन एक हिस्सा होगा तो उसे पीपीएम (या पार्ट पर मिलियन) कहेंगे। डाक्टरों का कहना है कि अगरफ्लोराइड मिले पानी को अल्युमीनियम के बर्तन में उबाला जाए तो उसमें से 200 पीपीएम अल्युमीनियम निकलता है- कभी-कभी यह स्तर ऊंचा होकर 600पीपीएम तक जा सकता है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के चिकित्सकों ने भी कुछ समय पहले इस विषय पर काम किया था। उनका कहना था कि विभिन्न जांचों से मस्तिष्क में अल्युमीनियम की उपस्थिति का हमेशा ही संकेत मिला है। लेकिन मस्तिष्क की क्रियाशीलता में अंतर तभी दिखायी पड़ता है जब अल्युमीनियम की मात्रा सामान्य से दस गुना ज्यादा हो जाए। वैसे भी इस बात पर रोशनी नहीं पड़ सकी है कि मस्तिष्क के लिए सह्य अल्युमीनियम की उच्चतम मात्रा/सीमा कितनी है ?

बहरहाल, कार्डिफ विश्वविद्यालय, ब्रिटेन के डॉ. एम आयोरियान ने बाजार में उपलब्ध कई प्रकार की चाय का विश्लेषण किया। उनका कहना है कि भारतीय चाय में अल्युमीनियम की मात्रा 40 पीपीएम है, लेकिन शायद आपको अचरज लगे भारतीय चाय अन्यदेशों की चाय के मुकाबले कम विषाक्त है। रूसी चाय में अल्युमीनियम की मात्रा 100 पीपीएम और चीन की चाय में 60 पीपीएम है। इधर चाय के बागानों में खुलकर ऐसे उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिनमें एल्युमीनियम है। जैसे पोटाश एलम आदि। अल्‍युमिनियम सीधे दिमाग में प्रवेश नहीं करता, दिमाग कई तरह से ऐसे घातुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है इसे बारे में बिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान में बताया कि अल्‍युमिनियम फ्लोराइड ऑक्‍सीजन से मिलकर अल्‍युमिनियम ऑक्‍साइड बनाता है जिसे अल्‍युमिना कहते हैं । यही अल्‍युमिना अल्ज़ाइमर्स के मरीजों में पाया गया है जो वैज्ञानिकों को चिंतित हैं ।अल्ज़ाइमर्स अब कैसी बिमारी है इस पर कभी और बात करेंगे । अल्‍युमिनियम इतना निर्दोष माना जाता है कि कोई जन नीति इसके खिलाफ नहीं है । इन अनुसंधानों की रोशनी में यह महत्वपूर्ण है कि सुबह की चाय की चुस्की के साथ आप सोचें कि चाय की पत्ती से आपकी प्याली तक के सफर में अल्युमीनियम को कैसे दरकिनार किया जा सकता है।

Share This Article
Leave a Comment