मेगसायसाय पुरस्कार विजेता डॉ पीके सेठी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के आर्थोपीडिक सर्जन थे । जयपुर फुट का अविष्कार कर उन्होंने दसियों हजार दिव्यांगों को नया जीवन दिया। जयपुर फुट का निर्माण डॉ सेठी की देखरेख में स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था । प्रस्तुत आलेख सेमिनार में प्रकाशित (2002) उनके अंग्रेजी आलेख ‘डॉक्टर्स इन ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ का अविकल हिंदी रूपांतर है।लगभग डेढ दशक पूर्व लिखा गया यह आलेख आज भी समाज के हर हितधारक तबके को आधुनिक चिकित्सा पद्धति और चिकित्सकों को देखने का एक अलग नजरिया प्रदान करता है । हिंदी रूपांतर: विजय भास्कर।
बहैसियत एक डॉक्टर और शिक्षक के यह हम में से हरेक का सपना था कि हम चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान करें। उस तरह के क्लिनिकल रिसर्च, जैसा हमारे शिक्षक करते थे या जैसा दस्तावेज ओलिवर सैक्स ने तैयार किया था। लेकिन आज तो इन्हें अनुसंधान के ही योग्य ही नहीं समझा जा रहा। आधुनिक अनुसंधान काफी महंगा व्यापार हो गया है और इसके लिए अन्य स्रोतों से भारी मात्रा में वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है। सरकारी मुलाजिम होने के कारण मैं केवल अाधिकारिक वित्तीय संस्थानों से धन देने के लिए कह सकता था। लेकिन अनुसंधान के प्रस्तावों पर विचार-विमर्श के लिए जो उच्च स्तरीय समिति बनी होती है, उन्होंने हमारे अनुसंधान प्रस्तावों पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की उससे एक तरह हमें भारी निराशा हुई। ऐसे ही काम, जिसे वे महत्वपूर्ण समझते हैं, उन्हीं पर अनुसंधान होना है। इस स्थिति में अंततः होता वही है, जो नेता और नौकरशाह चाहते हैं।
अनुसंधान का प्रशासनिक तंत्र जिस जीर्ण-शीर्ण हालत में है, वह सच्चाई हमें स्वीकारनी होगी। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के गवर्निंग बॉडी का मैं सदस्य रहा हूं और अंदर तक इस प्रक्रिया को देखने-समझने का मुझे मौका मिला है। अंततः मुझे निराशा और आक्रोश में बाहर आना पडता है। वैज्ञानिक से नौकरशाह बने लोग तो अक्सर अपने पांव जमीन पर रखते ही नहीं। चूंकि उन्होंने ऐसा कुछ अपने क्षेत्र में हासिल नहीं किया होता है, जिसको व्यापक मान्यता मिले तो एक तरह से अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए ऐसे प्रस्तावों को खारिज कर देने में उन्हें काफी सुकूनमिलता है। बजाय इसके कि वे प्रतिभा की खोज करें, और यही तो उनका काम है। भारत में प्रतिभाओं की कमी भी नहीं है – लेकिन वे इस मुद्रा में बैठे रहते हैं कि कोई प्रतिभा आये और याचक की मुद्रा में उनके सामने घुटने टेक दे और करे वही जो वे कहें। इसलिए मेरे पास दूसरा कोई विकल्प यही था कि मैं अपने अनुसंधान कार्य के लिए समुदाय पर निर्भर रहूं और उनके प्रतिक्रिया का आकलन करता रहूं। ताम-झाम वाली महंगी प्रयोगशालाओं का चक्कर छोड़ दूं। वैसे भी, मेरे पास उतना पैसा नहीं था कि मैं अपनी एक प्रयोगशाला खड़ी कर पाता।
जब भारत सरकार ने कृत्रित अंगों और उपस्करों के लिए केंद्रीय उत्पादन इकाई शुरू की, तो वे इस बात को लेकर काफी खिन्न थे कि मैं उनके उत्पादों पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगा रहा हूं। उन्होंने मेरे राज्य की सरकार को लिखा कि जो कुछ भी मैं कर रहा हूं, उस पर रोक लगायी जाये। वह तो भला हो विज्ञान-टेक्नोलॉजी विभाग के एक संवेदनशील वैज्ञानिक का, जिसने कृत्रिम अंग बनाने के लिए पॉलियोमेलाइटिस मंगाने के लिए मुझे कोष उपलब्ध कराये। लेकिन उसके बाद जल्दी ही एक सज्जन आये और उन्होंने आदेश दिया कि मैं किसी दूसरे के साथ यह काम नहीं करूं, क्योंकि इस देश को उस विधि पर बौद्धिक संपदा का अधिकार प्राप्त है। ये यही लोग हैं कि जब कुछ भारतीय वस्तुओं पर पेटेंट के सिलसिले में कार्लाहिल्स यही बात कहती है तो चीखने-चिल्लाने लगते हैं।
जब मुझे लगा कि पश्चिमी देशों में बने हुए कृत्रिम अंग, बांह-पैर इत्यादि पूरी तरह से वहां की परिस्थितियों को देखते हुए बनाये गये हैं और हमारे देश के लिए यह बड़ी समस्या खड़ी कर सकते थे, तब मैंने एक ऐसी डिजाइन पर काम करना शुरू किया, जो इस देश के अनुकूल हो। क्योंकि वहां जूते पहनने, व्हील चेयर पर बैठने और अन्य काम करने की शैलियां भिन्न-भिन्न हैं। हमारे यहां तो नंगे पांव चलने-फिरने का रिवाज है। जब मैंने ऐसे कृत्रिम अंग बना लिये, तो उसके कई आलोचक सामने आये। वे कई तरह का नुक्श निकालने लगे, जबकि मेरे मरीज अपेक्षा से ज्यादा संतुष्ट थे। मुझ पर चिकित्सा में नीम-हकीमी को प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया गया। मेरे रास्ते में लगभग हर संभव अवरोध खड़े किये गये। यह सब बंद तभी हुआ जब मेरे काम को पश्चिमी देशों के लोगों ने सराहा। उसके बाद इसे स्थानीय स्तर पर ग्राह्य किया गया। यह अनुसंधान करनेवाले लोगों के समक्ष आनेवाली परेशानियों का एक नया आयाम पेश करता है। यहां उसी अनुसंधान को अहमियत मिलती है जिस पर विकसित देशों की नजर पड़े, भले ही वे हमारे कुछ काम के नहीं हों और यही कारण है कि हमारे यहां किये गये अधिकांश अनुसंधानों की अवधारणाएं उधार ली हुई होती हैं, अर्थहीन होती हैं और दोयम दर्जे की होती हैं। ख्यातिप्राप्त मिस्र के वास्तुकार हसन फैदी ने एक अद्भुत आलेख लिखा है – मैं चाहूंगा कि मेडिकल के क्षेत्र में अनुसंधान करनेवाले प्रेरणा के लिए इसे जरूर पढ़ें, लेकिन काश, मेरी ये सारी इच्छाएं पूरी हो पायें।
आज जब मैं मेडिकल शिक्षकों की बदहाली देखता हूं, अनुसंधान के वातावरण में इस देश में आयी विकृतियां देखता हूं, बाजार की शक्तियों के आगे जिस तरह से लोगों को घुटने टेकते हुए देखता हूं तो मुझे आश्चर्य होता है कि इस व्यवसाय को चुन कर क्या सचमुच मैंने सही कदम उठाया ? आज जिन परिस्थितियों में डॉक्टर काम कर रहे हैं वह शिनाख्त से परे तक बदल गयी हैं और जरूरत है कि इसे फिर से परिभाषित किया जाये।

