मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि विजय भास्कर के इस पुस्तक की श्रेणी की कोई पुस्तक कम से कम मुझे नहीं दिखी,जिसमें दो सौ वर्षों के समाचार पत्रों का इतिहास हो ।इस पुस्तक के अंत में 1780 से लेकर 1947 के मध्य प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों की सूची है , जिसमें उनके संस्थापकों ,संपादकों ,आवृतियों एवं उनके प्रकाशन स्थल का भी नाम शामिल किया गया है । विशेष संदर्भों के साथ 1780 से लेकर 1980 तक की समाचारपत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी इस पुस्तक में चिन्हित किया गया है ।
पत्रकारिता की एक ज़रूरी किताब
अभी कुछ ही दिन हुए मेरे पास एक पुस्तक आयी ‘कमुनिकेन’,जिसमें दर्ज है पत्रकारिता का इतिहास – दो सौ वर्षों का।यह एक प्रामाणिक पुस्तक है। परम्परागत लेखन से बिलकुल जुदा – अपने भीतर एक इतिहास को लेकर । इस पुस्तक में लेखक ने लिखा है कि पत्रकारिता के उद्गम और विकास में विज्ञान और तकनीक के साथ पत्रकारिता ने कैसे अपनी यात्रा प्रारम्भ की और सूचना को सुरक्षित रखने को संभव किया। इसके पहले श्रुति की परम्परा थी, जो गुरु के माध्यम से समाज तक पहुँच पाती थी।लेकिन अखबारों को जन-जन तक पहुंचाने में विज्ञान और तकनीकी इसे शनैः -शनैः मदद की, आगे बढाया और जनाकांक्षाओं की पूर्ति की। 15 वीं शताब्दी में जर्मनी से हुई शुरुआत प्रिंटिंग ने आज पांच सौ वर्ष से ज्यादा की अपनी एक लम्बी यात्रा तय की है ,जो जनमाध्यमों के विकास में एक महत्वपूर्ण घटक है ।
कुल छह अध्याय हैं इस पुस्तक में, जिसमें विज्ञान और तकनीक के साथ संचार के उद्गम, विकास ,स्वाधीनता आन्दोलन में समाचारपत्रों की भूमिका। गांधी जी की पत्रकारिता आदि के बारे में विस्तृत जानकारी है ।
1674 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बम्बई और 1772 में मद्रास में प्रिंटिंग प्रेस लगाया। पहला अखबार हिक्की गजट प्रकाशित हुआ,जिसने हिन्दुस्तान में पत्रकारिता की नींव रखी । फिर धीर- धीरे विकास की गति तेज होती गयी। पत्रकारिता ने देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।इसके मद्देनजर अंग्रेजों ने कानून भी बनाये, जिससे वे अपने विरुद्ध उठने वाली आवाज को दबा सकें। जिनमें वर्नाकुलर एक्ट भी एक है ।इन सभी का विस्तार इस पुस्तक में एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में मौजूद है ।
30 मई 1826 में उदंड मार्तंड का प्रकाशन कलकत्ता से शुरू हुआ, जो हिन्दी का पहला अखबार था । इसके बाद हिन्दी के अखबारों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, लेकिन इसकी प्रकाशन-अवधि बहुत कम थी – 4 दिसंबर 1827को इसका अंतिम संस्करण निकला ।लेकिन इस अखबार ने दूसरो को प्रोत्साहित किया,इस बात से असहमति नहीं जताई जा सकती । उसके बाद अख़बारों के प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ जो बनारस ,मध्य प्रदेश सहित लगभग सभी प्रान्तों तक पहुंचा ।
गांधी जी की पत्रकारिता में योगदान को भी काफी विस्तार दिया गया है ।गांधी जी को इस बात का एहसास हो गया था कि सामाजिक उत्थान सहित राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति बिना अखबार के संभव नहीं है । ।उन्होंने , हरिजन , इंडियन ओपिनियन जैसे अखबारों के जरिये अपने लक्ष्य के साथ जन जन तक पहुंचे । ।पत्रकारिता के इतिहास में यह “गांधी एरा” के नाम से जाना जाता है ।
मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि विजय भास्कर के इस पुस्तक की श्रेणी की कोई पुस्तक कम से कम मुझे नहीं दिखी,जिसमें दो सौ वर्षों के समाचार पत्रों का इतिहास हो ।इस पुस्तक के अंत में 1780 से लेकर 1947 के मध्य प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों की सूची है , जिसमें उनके संस्थापकों ,संपादकों ,आवृतियों एवं उनके प्रकाशन स्थल का भी नाम शामिल किया गया है । विशेष संदर्भों के साथ 1780 से लेकर 1980 तक की समाचारपत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी इस पुस्तक में चिन्हित किया गया है ।ऐतिहासिक तथ्यों तथा आंकड़ों के संकलन में निश्चित ही काफी परिश्रम करना पडा होगा, जिसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं।विजय भास्कर ने एक बातचीत में बताया कि इस पुस्तक को लिखने में लगभग तीन वर्ष लगे।अब वे इसको हिन्दी में भी लाने की योजना पर कार्य कर रहे हैं और अनुवाद भी स्वयं कर रहे हैं ।
विजय भास्कर एक विज्ञान लेखक के तौर पर पहले ही ख्याति अर्जित कर चुके हैं, विज्ञान लेखन में उन्हें विशेष रूप से भविष्य विज्ञान ( फ्युचरोलाजी )में दक्षता हासिल है ।उन्होंने अपनी पत्रकारिता टाइम्स ग्रुप से शुरू की और नव भारत टाइम्स ,प्रभात खबर ,लोक्मत समाचार ।दैनिक हिन्दुस्तान आदि समाचार पत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ।तीन वर्षों तक ब्रिटिश उच्चायोग, नई दिल्ली के ‘प्रेस एंड पब्लिक अफेयर्स ‘विभाग में वरिष्ठ सम्पादक रहे । ‘ सेंट्रल आफिस आफ इन्फार्मेशन और ‘ फारेन एंड कामनवेल्थ आफिसेस ‘लन्दन में विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया ।
इसके पूर्व विजय भास्कर की एक पुस्तक हिन्दी में ‘ बिहार में पत्रकारिता का इतिहास ‘ नाम से प्रकाशित हो चुकी है। अंगेजी में लिखी गयी विजय भास्कर की यह पुस्तक न सिर्फ पत्रकारिता के विद्यार्थियों, बल्कि अध्यापकों के लिए भी उपयोगी है । उम्मीद है कि हिन्दी में भी शीघ्र ही उपलब्ध होगी ।
विजय भास्कर छपरा जिले के मढौरा सब डिविजन से हैं ।
प्रो सुनील श्रीवास्तव, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दो दशकों तक पत्रकारिता का शिक्षण ।राष्ट्रीय स्तर के कहानीकार और धर्मयुग के पूर्व संपादकीय कर्मी।
अखबारों में काम आने वाला विज्ञान और प्रौद्योगिकी
डॉ विजय भास्कर ने इस विषय पर अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी है कम्युनिकेशन – इमरजेंस, इवोल्यूशन एंड इट्स प्रोग्रेसन इनटू न्यूजपेपर्स। इसमें विज्ञान व टेक्नालॉजी की प्रगति के बारे में बताया गया है जिससे अखबारों का विकास हुआ। इस टेक्नालॉजी का सबसे अच्छा हिस्सा यह है कि भारत का पहला समाचार पत्र, हिकीज गजट जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में बाकायदा संरक्षित रखा गया है और भारतीय अखबारों की रिपोर्ट का भाग ब्रिटिश लाइब्रेरी, लंदन में माइक्रोफिल्म के भाग के रूप में संरक्षित है। पुस्तक के मुताबिक, 1857 के बाद भारतीय प्रेस का द्रुत विकास हुआ। हालांकि, भिन्न प्रतिबंधों के कारण भारत में तकनालाजी का आगमन धीमा रहा।
अखबारों की छपाई के लिए स्टेट्समैन ने भारत में सबसे पहले वाष्प ऊर्जा का प्रयोग किया था। हालांकि, अखबारों में नवीनतम टेक्नालॉजी का उपयोग करने में द हिन्दू सबसे आगे रहा है और सबसे पहले फैसिमाइल एडिशन उसने ही छापना शुरू किया था जो दिल्ली संस्करण होता है। वैसे, टाइम्स ऑफ इंडिया, स्टेट्समैन, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू उन अखबारों में हैं जो प्रौद्योगिकी के लिहाज से दुनिया भर के अच्छे अखबारों की टक्कर में हैं। भाषायी अखबारों में भी ऐसे ही सुधार हुए हैं। और इसके बाद से भारतीय अखबार लगातार प्रगति कर रहे हैं।
वैसे तो इस पुस्तक में दुनिया भर के अखबारों की चर्चा है लेकिन 1780 से 1980 तक प्रकाशित भारतीय अखबार ही इसके फोकस में है। कहने की जरूरत नहीं है कि जनसंचार एक विशाल विषय है। इस पुस्तक में विज्ञान व टेक्नालॉजी पर उतनी ही बात की गई है जिससे अखबारों का प्रकाशन संभव होता है। 1780 में भारत का पहला अखबार बंगाल गजट या द ओरिजनल कलकत्ता जनरल एडवाइजर छपा था। पुस्तक में अध्ययन के इन 200 वर्षों को गुटनबर्ग से पहले और बाद के दो हिस्सों में बांटा गया है। गुटेनबर्ग की खोज के बाद छापाखाना का विस्तार हुआ जिससे अखबारों का प्रकाशन संभव हुआ। हालांकि, ऐसा नहीं है कि गुटनबर्ग से पहले की दुनिया ने बिल्कुल चुप्पी सी ओढ रखी थी ।
छपाई और कागज बनाने की कला का उपयोग सबसे पहले चीन ने किया था। स्याही, कागज और टाइप का विकास चीनियों ने सबसे पहले किया और पहला अखबार सिल्क पर निकाला। यह यूरोप से होता हुआ भारत आया था। 17वीं सदी के मध्य तक यूरोप और उत्तरी अमेरिका में छपाई एक आम घटना थी। हालांकि, सबसे पुराना पत्रकारीय प्रयास रोम का जाना जाता है जबकि अखबार किसी जर्मन प्रकाशक का था जो फ्रांस से निकला था। उल्लेखनीय महत्व का एक अन्य अखबार जर्मन भाषा का था जो 1856 से 1943 तक प्रकाशित हुआ।
18वीं सदी के पहले दशक में यूरोप और अमेरिका में पत्रकारिता एक स्थापित गतिविधि हो चली थी । भारत ने मोटे तौर पर ब्रिटिश प्रेस की विरासत को हासिल किया और यह प्रौद्योगिकी तथा बौद्धिकता दोनों के लिहाज से है रेखांकित करने वाला तथ्य है। फिल्में जनसंचार का अन्य माध्यम हैं। 1940 में बंबई, कोलकाता और मद्रास में सामाजिक तौर पर प्रासंगिक फिल्मों का निर्माण शुरू हुआ तो अब गांवों तक पहुंच चुका है। प्रसारण (ब्रॉडकास्ट) मीडिया की शुरुआत 1927 में हुई थी जो बाद में सरकारी नियंत्रण में आ गया और आकाशवाणी बना। 1947 में 11 रेडियो स्टेशन थे जबकि टेलीविजन 1959 में आया।
इस पुस्तक के कुछ अध्याय इस प्रकार हैं – राष्ट्रीय आंदोलन में मीडिया की भूमिका, भारत में पत्रकारिता के विकास में गांधी की भूमिका, संचार के उदय और विकास के पीछे विज्ञान व टेक्नालॉजी । इसके अलावा 1780 से 1980 की अवधि में मीडिया की भूमिका पर भी एक अध्याय है। कुल मिलाकर मीडिया और उसके विज्ञान पर यह एक दिलचस्प किताब है और इसमें छपाई की मशीन और उसकी प्रगति की अच्छी चर्चा है। खास बात यह भी है कि पुस्तक का कालखंड 1980 तक ही है और यह अलग विषय है कि उसके बाद के 40 वर्षों में मीडिया का क्या हुआ यह वह कितना महत्वपूर्ण रह गया।
पत्रकारिता में पीएचडी कर चुके विजय भास्कर विज्ञान में स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई पूरी करके आए थे और मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया के ट्रेनी पत्रकार बने। प्रभात खबर रांची, नवभारत टाइम्स पटना होते हुए ब्रिटिश हाई कमीशन दिल्ली में रहे और फिर जयपुर, नागपुर, भागलपुर, पटना और जमशेदपुर में अखबारों में भिन्न पदों पर काम किया। और दशकों तक विश्वविद्यालय स्तर पर पत्रकारिता पढ़ाई है। विज्ञान व टेक्नालॉजी पर खूब लिखा है और पुरस्कार भी पाए हैं। नेशनल साइंस कम्युनिकेशन कांग्रेस के कुछ सत्रों की अध्यक्षता भी की है। उनकी यह पुस्तक 299 रुपए की है और नोशन प्रेस ने छापी है। अमैजन पर उपलब्ध है। बिहार में पत्रकारिता के इतिहास पर वे एक पुस्तक पहले लिख चुके हैं।
संजय सिंह, जनसत्ता में दीक्षित पत्रकार और राष्ट्रीय ख्याति के अनुवादक ।
The Book with many Pluses
Shailesh Kumar Singh
Dr. Vijay Bhaskar, the author of the book Communication: Emergence, Evolution and its Progression into Newspapers, has a Masters of Science degree with a PhD in journalism. He has served as a journalist and editor in different media groups in India. This book is an outcome of his long experience and research.
I find this book a must-read for those who feel they are a student of communication and journalism and they want to learn the basics of communication. Likewise, this book is also a must must-read for those who practice and profess communication and journalism. Those who are a student can benefit more as it will make them knowledgeable and develop a research-friendly approach towards knowledge. The references given in this book covers modern-day references as well as references from classical Indian scriptures in Sanskrit.
One can broadly divide this book into four segments. In the first, the author has covered the evolution and growth of communication. How humans started to communicate in the first place has been dealt with scientifically and then goes on to record mediums of communication such as stones, metal, wax, ostraca, clay tablets, papyrus for writings before the advent of paper and modern technology of printing. The author has discussed Hyoid Bone and the Human’s Ability to Communicate. Approaching communication this way is something very new and gives readers a new perspective to understand communication from the point of view of human anatomy. The author says ” Humans are gifted by nature with some anatomical features that are exclusive to the species and give it immense capacity to render complex speech. That is the hyoid bone, a small horseshoe-shaped bone suspended in the muscle of our neck. Like a piece of fruit trapped in Jell-O. The hyoid bone is the only bone in the body that is not connected to any other bone. He has discussed bipedalism in detail, which gave an erect posture to humans to make the speech possible.
In the second segment, the writer has covered the development of news and media during British India and its role in the Indian national movement. The first newspaper that made its appearance on the Indian scene was James Augustus Hicky’s Bengal Gazette which was popularly known as Hicky’s Gazette. This was in 1980. Book also covers the meteoric rise and mercurial fall of Hicky who faced government pressure and censorship. Later in 1813 governor-general imposed a new rule in which one of the clauses stated that all notices, handbills and other ephemeral publications be in the like manner previously transmitted to the chief secretary for his revision.
In the third segment, the writer has described Gandhi as a journalist who started many newspapers including Indian Opinion in South Africa. After arriving in India, he wrote, ” the editing of ‘NAVAJIVAN’ has been a kind of revelation to me. Gandhi changed the tone and temper of Indian journalism. He started a new era in journalism that advocated non-violence as the way of getting independence. This voice of non-violence echoed in Indian newspapers and ultimately became the voice of the people. As a journalist, Gandhi experimented more with Harijan and Young India. On deterioration of journalism once he wrote- ” It is an established practice with newspapers to depend on revenues earned mainly from advertisements rather than from subscription. The result has been appalling or shocking that has led newspapers to live and survive on contradictions. The very newspaper which writes against the use of wine publishes an advertisement in praise of wine in the same issue. This practice has come entirely from the west. No matter the cost or effort, we must put an end to this undesirable practice or at least reform it. Every newspaper has to exercise some restraint in the matter of the advertisement. The author opines that Gandhi did not live long to find a way out of this nexus which has changed the face of journalism beyond recognition.
The fourth segment of the book has broadly covered the development of media houses in India starting from Hicky’s Bengal Gazette covering the story of The Times of India, Indian Express, Hindu and The Pioneer apart from newspapers published in Hindi, Bangla, Tamil, Telugu and Assamese etc. The book recalls two Nobel laureates Rudyard Kipling and Winston Churchill who were once associated with The Pioneer published from Allahabad.
The book provides sufficient background to understand the Emergency in India, journalism during the emergency and the fact that the same instruments were applied by the Indian State to gag the press that was once used by a foreign ruler.
These chapters make interesting reading and should be useful to readers in general as well as hardcore professionals. Details of Indian Newspapers starting from 1780 to 1947 in almost all languages, their first editors, place of publication and periodicity from all the corners of the country is a bonus. I wish him all success.
The reviewer is a journalist who worked in Navbharat Times Patna and now works as Regional Manager ( Lube division) Apar Industries Limited, Patna

