गॉड पार्टिकल और सर्न लैब का एक दशक Decade of God Particle and CERN Lab गॉड पार्टिकल का मिलना नहीं

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क्या गॉड पार्टिकल के मिलने का मतलब गॉड का मिलना है? इसका उत्तर है नहीं। हिग्स बोसोन पार्टिकल मिलना सृष्टि के निर्माण को समझने की ओर एक सकारात्मक कदम है, इसे ईश्वर से जोड़ना या कहना है कि इस काम की खोज के साथ ही सृष्टि के निर्माण के सारे रहस्य हमारे हाथ आ गए हैं, इस खोज की एक अतिरेकपूर्ण अवैज्ञानिक व्याख्या है।

डार्विन के विकास की खोज हो या न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण की खोज यह वर्तमान सृष्टि की विभिन्न अभिव्यक्तियों से परिचित होना है। गुरुत्वाकर्षण की खोज ने हमारी दृष्टि इस बारे साफ की कि कैसे पूरी सृष्टि गुरुत्वाकर्षण के केंद्र से बंधी है। बहुत दिनों से वैज्ञानिकों को इसी गुरुत्वाकर्षण की एक कड़ी खोजे नहीं मिल रही थी। सवाल जो वैज्ञानिकों को परेशान किये हुए था वह यह था कि आखिर मौलिक कणों में वह द्रव्यमान कहां से आ गया जिस पर पूरा का पूरा गुरुत्वाकर्षण का तंत्र खड़ा है। द्रव्यमान का यह कण दरअसल 1964 में ही कागज पर आ गया था। 1964 में पीटर हिग्स ने एक सिद्धांत सामने रखा कि महाविस्फोट के बाद उभरे शून्य में एक ऐसी चादर फैल गयी होगी जिससे गुजरते हुए परमाणुओं ने खिंचाव महसूस किया होगा और वह उनका द्रव्यमान बन गया होगा। अब समस्या यह थी कि इसका व्यावहारिक पक्ष कैसे सामने लाया जाए। एक बहुत ही कठिन सा लगनेवाला तरीका बच रहा था कि महाविस्फोट (बिग बैंग) का माहौल तैयार कराया जाए और उसमें देखा जाए, हिग्स बोसोन कण पैदा होते हैं या नहीं। विज्ञान में पहले किसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है फिर यह देखा जाता है वह सिद्धांत हर दृष्टि से खरा उतरता है या नहीं। फिर व्यावहारिक प्रयोग कर सिद्धांत की अक्षरशः पुष्टि करनी होती है तभी उसे वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में मान्यता मिलती है। कणों में अपना द्रव्यमान नहीं होता तो क्या होता ?

प्रकाश के कण प्रोटोन में द्रव्यमान नहीं होता। इसीलिए वह प्रकाश की वेग से सफर करते हैं। अगर परमाणुओं को अपना -अपना द्रव्यमान नहीं मिलता तो उसके सभी कण और सृष्टि में उत्पन्न अन्य कण प्रकाश के वेग से ही सफर कर रहे होते और सृष्टि में अराजक स्थिति बन जाती। यह द्रव्यमान ही है जो एक परमाणु को दूसरे से, दूसरे को तीसरे से अलग करता है और सृष्टि इतनी विभिन्नताओं से भर गयी है। क्योंकि ऐसा शुरू में ही हुआ होगा इसीलिए सिद्धांत की व्यावहारिक पुष्टि के लिए जरूरी था कुछ ऐसे प्रयोग किये जाएं जैसे पहले कभी नहीं किये गये। इसका दायित्व सौंपा गया स्विट्ज़रलैंड की सर्न लैब को। सर्न लैब, जिनेवा में धरती के नीचे 27 किलोमीटर लम्बी टनल में बना बेहद जटिल और क्षमता से भरी मशीनों का जाल है जहां पूरे विश्व के 2,600 भौतिकविद और इंजीनियर काम करते हैं। सर्न लैब, वास्तुशिल्प और आधुनिकतम विज्ञान और टेक्नोलॉजी का एक विरल संगम है। यहां बिग बैंग या महाविस्फोट का एक छोटा रूप तैयार कर यह देखना था कि कण कैसे व्यवहार करते हैं।इसके लिए प्रकाश के वेग से प्रोटोन कणों को एक दूसरे की विपरीत दिशा में भेजकर उनकी टक्कर करायी गयी। किसी भी कण के विस्फोट से निकलनेवाली ऊर्जा बराबर होती है उस कण के द्रव्यमान x प्रकाश के वेग का वर्ग (स्क्वायर)- आइंस्टाइन का सिद्धांत [E=MC2] । प्रकाश का वेग एक 1,86,000 मील प्रति सेकंड होता है इसीलिए छोटे से छोटे कणों के विस्फोट से निकली ऊर्जा का अनुमान लगाया जा सकता है। सर्न के इस प्रयोग के बाद ऊर्जा की सही-सही माप की जा सकी और इससे बोसोन कणों की पुष्टि हुई। ऊर्जा की मात्रात्मक विशालता को देखते हुए सर्न के इस प्रयोग को लेकर शुरू में ऐसी आशंकाएं जतायी गयी थी कि अगर प्रयोग अनियंत्रित हो गया तो क्या होगा? यह चिंता सैद्धांतिक रूप से अश्वेत विवर [Black Hole] बन जाने को लेकर थी। पर सर्न ने अपनी साइट पर पहले ही ऐसी किसी सम्भावना से इंकार कर दिया था। कई समाचार चैनलों ने इस आशंका को लेकर महाप्रलय की खबरें भी चलायी थीं। बीच में सर्न के प्रयोग को कुछ तकनीकी कारणों से बंद भी करना पड़ा था। जिसे लेकर और अनिश्चितता फैली।समाचार चैनलों को प्रलय मचाने थोड़ा और अवसर मिल गया ।

बहरहाल दुनिया भर के वैज्ञानिकों के सहयोग से चल रहे इस प्रयोग के सार्थक परिणाम 2012 में 4 जुलाई को जारी किये गए। सर्न में वैज्ञानिकों की दो अलग अलग टीमें इस पर काम कर रही थी और वे इस समान परिणाम के साथ साथ सामने आयी प्रोटोनों की भीषण टक्कर से ऐसे कण की उत्पत्ति हुई जिसकी प्रकृति बहुत कुछ सैद्धांतिक कल्पना से मिलती जुलती थी। ये कण उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं। ऐसा मानने के अब पर्याप्त कारण थे कि वहां विस्फोट के बाद कणों को द्रव्यमान देकर हिग्स बोसोन कणों की चादर सृष्टि में ही विलीन हो गयी होगी।

हमें यह याद रखना चाहिए कि यह एक कण की खोज है और पिछले सौ सालों में इसे विज्ञान की सबसे बड़ी खोज कहा जा रहा है। इस कण की खोज कणिका भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) को और समृद्ध करेगी। और आगे अनुसंधान के लिए इसने दसियों और दरवाजे खोल दिए हैं। यह हमारे जीवन को उसी तरह प्रभावित कर सकता है जिस तरह इलेक्ट्रॉन के उपयोग के बाद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों न हमारे रहन-सहन जीवनशैली और औषधि के क्षेत्र को प्रभावित किया। अगर हम यह कहें कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रयोग करने के कारण ही हिग्स बोसोन को इतनी जल्दी खोज लिया गया तो कोई अतिश्योक्ति नहींहोगी। पीटर हिग्स जिनके नाम हिग्स बोसोन, कणों का नाम रखा गया है। उन्होंने रुंधे गले से बताया कि मुझे नहीं लगता था कि अपने जीवनकाल में ही अपनी कल्पना को सत्य का जामा पहनते हुए मैं देख सकूंगा। पर इलेक्ट्रॉन ने पूरी दुनिया क एक अद्भुत गति दे दी है। आइंस्टाइन ने एक बार कहा था कि ईश्वर सूक्ष्म जरूर है पर वह धोखेबाज या दुष्ट नहीं हो सकता। इसीलिए आइंस्टाइन पर हम भरोसा करके चले कि ईश्वर अगर यहीं है तो उन्हें छुपने छिपाने की जरूरत नहीं ही महसूस होती होगी।

सर्न को हिग्स बोसोन के बारे में भी और आंकड़े जुटाने होंगे। सर्न के वैज्ञानिक सृष्टि के निर्माण को समझने की कोशिश कर रहे हैं वे भगवान या गॉड को नहीं खोज रहे। हिग्स बोसोन गॉड पार्टिकल का नाम इसलिए दे दिया गया था कि बहुत कुछ करने के बावजूद यह दर्शन दे ही नहीं रहा था।

सर्न लैब 80 के दशक से ही कार्य कर रहा है। पर आम चर्चा में यह नाम 2012 में आया जब यहाँ हिग्स बोसोन पार्टिकल की

खोज हुई। 2000 में इसमें, बड़े हेड्रॉन कोलाइडर लगाये गये। सर्न, सृष्टि के मौलिक कणों [फंडामेंटल पार्टिकल्स] को समझने का प्रयास है जिससे पार्टिकल फ़िजिक्स के मानक मॉडल को ठीक से समझा जा सके।1970 के दशक में विकसित इस मानक मॉडल ने हर हाल में सही होने की अनोखी क्षमता दिखायी है।

आम तौर पर यह लग सकता है कि सर्न में हिग्स बोसोन कणों की खोज के बाद कुछ ख़ास नहीं हुआ। पर, ऐसा नहीं है। यहां काम कर कर रहे वैज्ञानिक लगातार हिग्स बोसोन कणों के पार जा रहे हैं।और कई नई कणों की खोज ने उनकी दृष्टि विकसित की है जिससे पार्टिकल फिजिक्स को और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।हिग्स बोसोन इस प्रवेश द्वार की कुंजी था इसलिए स्वाभाविक रूप से आम नैरेटिव में वही बना हुआ है।1912 में हिग्स बोसोन कणों की पुष्टि के बाद 1913 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार पीटर हिग्स और फ्रांस्वां इंगलेर्ट को संयुक्त रूप से दिया गया था।

यहीं पर काम करते हुए ब्रिटिश वैज्ञानिक टीम बर्नर्स ने 1989 में वर्ल्ड वाइड वेब [W3]की खोज की थी।

ऐसी और जानकारियां आने वाले समय में आपसे साझा करते रहेंगे।

Images Courtesy: STDM higgs and field D/ Cern Lab, Geneve, Switzerland.

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