बहुत पुरानी दवा है दर्द निवारक एस्पीरीन। विकासशील देशों में जहां दर्द निवारक के रूप में इसे चने-बादाम की तरह फांका जाता है वहीं विकसित देशों में वैज्ञानिकों को सलाह दी गई कि इसके प्रभावों और इसकी गुणवत्ता का और अध्ययन करें। कारण लोगों में इसका प्रचलन इस तेजी के साथ बढ़ रहा था कि इसके अपेक्षित वैश्विक प्रभाव की आशंका से लोग घबड़ाने लगे थे। भय यह भी था कि इसकी लोकप्रियता वैषिक प्रभाव के कारण आगे आने वाली पीढि़यों को किसी भयानक त्रासदी की ओर न धकेल दें। जर्मनी की कंपनी बायर ने दुनिया को सबसे पहले एस्पीरिन से परिचित कराया । यह दवा बनाने वाली दुनिया बड़ी कंपनियों में से एक है ।
रासायनिक रूप से एस्पीरीन एसीटाइल सेलीसाइक्लिक अम्ल होता है, पर नए प्रयोगों के बाद जो बात सामने आयी वह चैंकाने वाली थी। 22 हजार अमेरिकी डाक्टरों ने एस्पीरीन के प्रभावों का अध्ययन करना शुरू किया। उनके निष्कर्ष न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित किये गये। उनका निष्कर्ष था कि यदि कोई प्रौढ़ व्यक्ति हर दूसरे दिन एस्पीरीन लेता है तो उसे दिल का दौरा पड़ने की संभावना 50 फीसदी कम हो जाती है। डाक्टर आश्चर्यचकित थे- कहां तो खोजने चले थे वैषिक प्रभाव और हाथ लग गया गुरुमंत्र। अमेरिका में एस्पीरीन बनाने वाली कंपनी स्टर्लिंग ड्रग ने इस प्रभाव को उकेरते हुए टीवी कमर्शियल भी तैयार कर लिया और एस्पीरीन बनाने वाली दूसरी कंपनी ब्रिस्टल मायर्स ने टीवी पर समय लेने के लिए रात दिन एक कर दिया। नतीजतन एस्पीरीन के इस पक्ष को उजागर करने वाले विज्ञापन धड़ल्ले से आने लगे।
स्टर्लिंग ड्रग और ब्रिस्टल मायर्स दोनों बड़ी कंपनियां है और इनका व्यापार अरबों डालर में है। प्रभाव के लिहाज से एलोपैथी दवाओं के अब तक के इतिहास में यह सबसे अनोखी घटना हुई है। रोग निदान अध्ययन से यह साफ-साफ पता चला है कि एस्पीरीन दिल के दौरे में काफी कमी कर सकता है। विशेष कर उनके लिए यह ज्यादा प्रभावी होगा जो हृदय के किसी अन्य रोग से पीडि़त रहे हों। पता तो यहां तक चल गया है कि दिल का दौरा पड़ते समय भी यह रोगी की स्थिति में काफी सुधार ला सकता है। इस नयी खोज से डाक्टरों का उत्साहित होना लाजिमी था और डाक्टरों की एक टोली ने पूरे विश्व के 17 हजार लोगों पर इसका परीक्षण किया। वैज्ञानिक दृष्टि से एस्पीरीन के प्रयोग से शरीर से थ्रोम्बोक्सेन (हारमोन जैसा पदार्थ) निकलना बंद हो जाता है। थ्रोम्बोक्सेन के कारण ही रक्त में थक्के जमते हैं। इस प्रक्रिया को थ्रोम्बोक्सेन कहा जाता है और दिल के दौरे को कोरोनरी थ्रोम्बोसिस का नाम दिया जाता है।

एस्पीरिन का न्यूजीलैंड में प्रचार, लगभग 1929, साभार बायर ।
यह तो हुई अमेरिकी वैज्ञानिकों की बात। जहां तक ब्रिटिश वैज्ञानिकों का सवाल है वे समान निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कार्य क्षेत्र सीमित था। उन्होंने 5 हजार लोगों पर एस्पीरीन का परीक्षण किया। उनका कहना था हमें कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिला जो यह सिद्ध करे कि एस्पीरीन लेने से दिल के दौरे की संभावना 50 प्रतिशत कम हो जाती है। ब्रिटिश डाक्टरों की रपट ब्रटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है।
इस तरह दो विपरीत परिणाम आमने-सामने आये तो परस्पर विपरीत परिणामों का कारण जानने को स्वाभाविक जरुरत महसूस हुई। उल्टे परिणामों का कारण खोजने पर पता चला कि ब्रिटिश डाक्टरों ने लोगों ने दवा की खुराक ज्यादा दी थी। एक सर्वमान्य रासायनिक सिद्धान्त यह है कि एस्पीरीन की ज्यादा खुराक प्रोस्टासाइकलिन नामक हारमोन बनाने की प्रक्रिया रोक देती है। यही हारमोन रक्त में थक्के जमने की प्रक्रिया पर रोक लगाता है। हां, यदि एस्पीरीन की खुराक कम हो तो प्रोस्टासाइक्लिन बनने पर उसका असर नहीं पड़ता और थक्के जमने की प्रक्रिया स्वरूप नहीं ले पाती। यह एक कारण हो सकता है परस्पर उल्टे निष्कर्षों का।
वैसे अमेरिकी अनुसंधान से एक और बात यह सामने आयी कि जिन लोगों ने नियमित रूप से एस्पीरीन का लंबे समय तक सेवन किया उनमें मस्तिष्क स्राव की संभावना बढ़ गयी। लेकिन एक तरह से यह कहें कि अमेरिकी डाक्टरों ने इस दुष्प्रभाव पर टनों एस्पीरीन डाल कर इसे दफन कर दिया है और वे दिल के दौरे वाले प्रभाव को उजागर कर प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। किस्सा कोताह यह कि अगर इसके दुष्प्रभाव को दबाया न गया तो एस्पीरीन बनाने वाली फैक्टरियों के भट्ठे बैठ जाएं। इसलिए ज्यादा उम्मीद यही है कि वर्तमान एस्पीरीन लगभग एक दशक तक दिल को सुकून देने वाला बना रहेगा।
फोटो सौजन्य – बायर की साइट https://www.bayer.com/en/products/aspirin
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किसी भी दवा के उपयोग से पहले अपने डॉक्टर की राय अवश्य लें ।

